बड़ी खबर : टीईटी से राहत के लिए 1998 बैच के शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई गुहार
आरटीई एक्ट 2009 और टीईटी अधिसूचना 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों ने दायर किया अंतरिम आवेदन
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष रखी अपनी दलील
पेण्ड्रा। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर जारी कानूनी लड़ाई के बीच छत्तीसगढ़ के शिक्षकों ने राहत की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। आरटीई एक्ट 2009 और टीईटी अधिसूचना 2010 लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत देने की मांग करते हुए जीपीएम (गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही) जिले के 1998 बैच के शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम आवेदन (Interlocutory Application) दायर किया है।
यह आवेदन अधिवक्ता विशाल अरुण मिश्रा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
28 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं शिक्षक
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता बने शिक्षक वर्ष 1998 बैच के हैं और लगभग 28 वर्षों से शिक्षा विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें विकासखंड पेण्ड्रा के एलबी संवर्ग के शिक्षक प्रशांत शर्मा, सेमलाल साहू, गीताराम साहू, सुरेश राठौर, गणेश यादव एवं रजनी कोरी शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मध्यप्रदेश शासन द्वारा शिक्षा कर्मी पदों पर नियमित भर्ती की गई थी। शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति उस समय लागू राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) अधिनियम 1993 के प्रावधानों एवं शासन द्वारा निर्धारित अर्हताओं के आधार पर हुई थी।
इस आवेदन में छत्तीसगढ़ के बम्हनीडीह, भानुप्रतापपुर, कांकेर, बस्तर, मोहला-मानपुर और नारायणपुर सहित अन्य क्षेत्रों के शिक्षक भी शामिल हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों के शिक्षकों ने भी राहत की मांग उठाई है।
सुप्रीम कोर्ट के 8 सितंबर के निर्देश के बाद बढ़ी उम्मीद
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राजेश चौहान विरुद्ध भारत संघ की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 8 सितंबर को अंतरिम निर्देश जारी किए थे।
इसमें अगले आदेश तक स्कूलों या कॉलेजों में किसी भी शिक्षक की नियुक्ति अथवा समाहित किए जाने के संबंध में निर्धारित शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं का पालन सुनिश्चित करने की बात कही गई थी।
इस निर्देश के बाद उन शिक्षकों में उम्मीद जगी है, जिनकी नियुक्तियां आरटीई एक्ट 2009 और टीईटी अधिसूचना 2010 लागू होने से पहले हुई थीं।
शिक्षकों का तर्क है कि जब उनकी नियुक्ति तत्कालीन शासन द्वारा निर्धारित अर्हताओं के आधार पर की गई थी, तब बाद में लागू किए गए नए पात्रता नियमों को पूर्ववर्ती नियुक्तियों पर लागू करना उचित नहीं है।
उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों में भी भर्ती के समय लागू नियमों के महत्व को स्वीकार किया गया है। इसलिए नई अर्हताओं को पुरानी नियुक्तियों पर लागू करने के मामले में राहत दी जानी चाहिए।
2017 में आरटीई एक्ट में संशोधन बना टीईटी विवाद की बड़ी वजह
शिक्षकों के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा 17 अक्टूबर 2017 को आरटीई एक्ट में किया गया संशोधन टीईटी की अनिवार्यता से जुड़ी वर्तमान समस्या का एक प्रमुख कारण है।
संशोधन में प्रावधान किया गया था कि 31 मार्च 2015 तक नियुक्त अथवा पदासीन ऐसे शिक्षक, जिन्होंने निर्धारित न्यूनतम अर्हताएं प्राप्त नहीं की हैं, उन्हें संशोधन अधिनियम लागू होने की तारीख से चार वर्ष के भीतर न्यूनतम अर्हताएं प्राप्त करनी होंगी।
शिक्षकों का मानना है कि इसी संशोधन के प्रावधानों के चलते पुराने नियुक्त शिक्षकों के सामने टीईटी की अनिवार्यता का प्रश्न खड़ा हुआ है।
केंद्र सरकार के जवाब पर भी टिकी निगाहें
अब इस अंतरिम आवेदन की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब पर भी शिक्षकों की निगाहें टिकी हुई हैं।
शिक्षकों ने केंद्र सरकार से अपील की है कि टीईटी अधिसूचना जारी होने से पहले शासन द्वारा निर्धारित अर्हताओं के आधार पर नियमित भर्ती हुए शिक्षकों को राहत प्रदान की जाए।
उनका कहना है कि वर्षों पहले विधिवत भर्ती होकर सेवाएं दे रहे शिक्षकों पर बाद में लागू की गई नई अर्हताओं को अनिवार्य करने से नौकरी की निरंतरता को लेकर असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट में दायर इस अंतरिम आवेदन पर सुनवाई के दौरान क्या रुख सामने आता है और टीईटी की अनिवार्यता से राहत की मांग कर रहे पुराने नियुक्त शिक्षकों को न्यायालय से क्या राहत मिलती है।
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