रेंजर से उपवनमंडलाधिकारी तक का सफर, गरियाबंद जिले में सात साल से जमे मनोज चंद्राकर
एक ही जिले में लंबे समय से पदस्थ रहने पर उठे सवाल, विभागीय व्यवस्था और तबादला नीति पर भी नजर

गरियाबंद।गरियाबंद वन मण्डल में लंबे समय से एक ही जिले में पदस्थापना को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। मनोज चंद्राकर के गरियाबंद जिले में करीब सात वर्षों से लगातार जमे रहने और इस दौरान रेंजर से उपवनमंडलाधिकारी (एसडीओ फॉरेस्ट) तक का सफर तय करने को लेकर विभागीय हलकों में चर्चा तेज है।
बताया जा रहा है कि मनोज चंद्राकर ने गरियाबंद जिले के गरियाबंद वन परिक्षेत्र में रेंजर के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत की और लंबे समय तक इसी जिले में पदस्थ रहते हुए गरियाबंद उपवनमंण्डलाधिकारी के पद पर रहने के बाद देवभोग उप वनमण्डलाधिकारी के बाद अब गरियाबंद वन मण्डल अन्तर्गत राजिम उप वन मण्डलाधिकारी के पद पर तबादला एक ही जिले एक ही वन मण्डल में । सामान्य तौर पर शासकीय सेवाओं में लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर समय-समय पर स्थानांतरण और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर अधिकारियों-कर्मचारियों की पदस्थापना में बदलाव किया जाता है। ऐसे में एक ही जिले में लगभग सात वर्षों तक लगातार बने रहने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।
पद बदला, लेकिन जिला नहीं
सबसे बड़ा सवाल यही है कि रेंजर से उपवनमंडलाधिकारी तक पदोन्नति और जिम्मेदारियों में बदलाव के बावजूद पदस्थापना का जिला क्यों नहीं बदला? विभागीय जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में पदस्थ रहने से अधिकारी को स्थानीय स्तर पर विभागीय गतिविधियों, वन क्षेत्र, कर्मचारियों और स्थानीय परिस्थितियों की गहरी जानकारी हो जाती है। वहीं दूसरी ओर, अत्यधिक लंबी पदस्थापना को लेकर पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता के सवाल भी उठ सकते हैं।
तबादला नीति की कसौटी पर सवाल
वन विभाग में स्थानांतरण नीति का उद्देश्य प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना और अधिकारियों-कर्मचारियों को अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने का अवसर देना भी माना जाता है। ऐसे में गरियाबंद जिले में करीब सात वर्षों से पदस्थ अधिकारी के मामले में यह देखना जरूरी हो जाता है कि इतने लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने के पीछे कौन-कौन से प्रशासनिक कारण रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर अब यह मांग भी उठ सकती है कि संबंधित अधिकारी की पदस्थापना अवधि, पदोन्नति के बाद जारी हुए पदस्थापना आदेश और शासन की स्थानांतरण नीति के अनुरूप उनकी स्थिति की समीक्षा की जाए।
जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी
लंबी पदस्थापना अपने आप में किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप साबित नहीं करती। लेकिन जब किसी अधिकारी का एक ही जिले में कार्यकाल असामान्य रूप से लंबा हो, तो प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से रिकॉर्ड सार्वजनिक होना और स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी हो जाता है।
अब देखना होगा कि वन विभाग के उच्चाधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या गरियाबंद जिले में मनोज चंद्राकर की लगभग सात वर्ष की पदस्थापना की विभागीय स्तर पर समीक्षा की जाती है।


